तीन प्रकार की देवात्माएँ:
विश्व ब्रह्माण्ड में जितनी प्रकार की देवात्माएँ हैं, उन्हें मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभक्त किया गया है।
1- प्रथम श्रेणी में सात्विक देवात्मायें हैं।
2- दूसरी श्रेणी में राजसी देवात्मायें हैं जिनको 'उपदेवता' कहते हैं।
3- तीसरी श्रेणी में तामसी देवता हैं जिनको 'अपदेवता' की संज्ञा दी गई है। सात्विक देवात्माओं का शरीर आकाश तत्व से निर्मित है। आकाश पञ्चतत्वों में मुख्य है, क्योंकि उसमें सभी अन्य तत्व एक-के-बाद-एक कर विलीन हो जाते हैं।
विभिन्न प्रकार की सात्विक साधना-उपासना आदि के द्वारा जब हम किसी सात्विक देवात्मा से संपर्क स्थापित करने का प्रयास करते हैं तो वह देवात्मा हमारे आकाशीय शरीर के प्रति आकर्षित होकर उसके माध्यम से हमारी भावना के अनुरूप, हमारी कामना को पूर्ण करती है।
हमारा आकाशीय शरीर जितना शुद्ध, निर्मल और सात्विक रहेगा, उतना ही उस देवात्मा की कृपा हमें उपलब्ध होगी।
दूसरी श्रेणी के देवता राजसी देवता कहलाते हैं। वे 'उपदेवता' हैं। उनके शरीर का निर्माण वायु तत्व से हुआ रहता है। वायु तत्व को सूक्ष्मतम-से-सूक्ष्मतम प्राण कहते हैं।
यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि इसी 'उपदेवता' की श्रेणी में आते हैं। वे रजोगुणी स्वभाव के होते हैं।
राजसी साधना-उपासना के द्वारा आकर्षित होकर ये उपदेवता हमारे प्राणमय शरीर से संपर्क स्थापित कर उसके माध्यम से हमारी कामना को पूर्ण करते हैं। हमारी राजसी साधना-उपासना जितनी अनुकूल रहेगी और हमारा प्राणमय शरीर जितना उस देवता के योग्य रहेगा, उतनी ही उस देवता की कृपा हमें प्राप्त होगी। यहाँ यह जानना आवश्यक है कि उपदेवताओं में प्राण-शक्ति की प्रबलता रहती है।
अपनी उसी शक्ति का आश्रय लेकर आवश्यकता पड़ने पर भौतिक शरीर भी धारण कर लेते हैं वे।
सात्विक देवात्मायें भाव की भूखी होती हैं। उनका एकमात्र भोजन 'भाव' है। वैसे ही राजसी उपदेवताओं का भोजन 'प्रेम', 'सौंदर्य', 'कला' और 'भावना' है। 'भाव' का सम्बन्ध 'आत्मा' से और 'भावना' का सम्बन्ध 'मन' से होता है। 'भाव' और 'भावना' में यही अंतर है।
कहने का आशय यह है कि *आत्माकर्षिणी* विद्या के द्वारा इन दोनों प्रकार के देवताओं को आकर्षित कर अपने मन के अनुकूल किया जा सकता है और अभीष्ट फल प्राप्त किया जा सकता है।
तीसरी श्रेणी में आते हैं 'अपदेवता'।
हाकिनी, डाकिनी, शाकिनी, पिशाच, बेताल आदि गुह्य योनि के अपदेवता हैं।
गुह्य योनि मानव योनि के बाद एक विशेष योनि है। इस योनि के अपदेवता कभी भी मानव योनि में जन्म नहीं लेते। वे अपनी ही योनि में जन्म लेते हैं। पिशाच से पिशाच ही जन्म लेगा, दूसरा और कोई नहीं।
हाकिनियों, डाकिनियों और शाकिनियों की भी सोलह-सोलह जातियां होती हैं। बेतालों की भी सोलह जातियां हैं। सभी जातियों के नाम अलग-अलग हैं। प्रत्येक जाति की साधना-उपासना अलग-अलग है।
ग्यारह जातियां पिशाचों की हैं। अपदेवताओं के शरीर का निर्माण 'अग्नितत्व' से हुआ रहता है। उनके स्वभाव में रजोगुण और तमोगुण दोनों का मिश्रण रहता है।
वे दयालु होते हैं तो क्रोधी भी। कल्याण भी करते हैं और अकल्याण भी। वे क्या करेंगे यह हमारी मनोदशा और नीयत पर निर्भर है।
यदि हमारी नीयत दूषित है तो वे क्रोधित हो कर अकल्याण कर देते हैं और यदि हमारी नियति स्वच्छ है, हितकारी है तो वे निश्चित ही कल्याण करते हैं। इनमें मनोबल और प्राणबल दोनों की अधिकता रहती है। कहाँ क्या हो रहा है--वे अपने मनोबल से तत्काल जान जाते हैं। उनका स्वभाव अति उग्र होता है।
तमोगुणी तांत्रिक विधि से की गई आत्माकर्षिणी विद्या की साधना से आकर्षित होकर वे भी साधक के मनोमय या प्राणमय शरीर द्वारा उससे संपर्क करते हैं और साधक का मनोरथ पूर्ण करते







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